पंचायत का फैसला
बरसों पुरानी बात है। एक छोटे-से गांव "रामपुरा" में लोग सादगी और आपसी मेल-मिलाप के साथ रहते थे। गांव के केंद्र में एक विशाल पीपल का पेड़ था, जिसकी छांव तले हर शाम गांव के लोग बैठकर अपनी समस्याएँ पंचायत के सामने रखते और न्याय की उम्मीद करते। गांव के बुजुर्ग मुखिया, रामनाथ चौधरी, अपनी ईमानदारी और निष्पक्षता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे।
एक दिन गांव में अजीब-सा विवाद खड़ा हो गया। श्यामलाल, जो गांव का किसान था, ने दावा किया कि उसकी खेत की एक सीमा पर पड़ोसी किसान रघुनाथ ने हल चला दिया और उसकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है। दूसरी ओर रघुनाथ का कहना था कि यह ज़मीन उसके दादा की है और पुराना कागज़ भी उसके पास है।
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गांव के लोग इस मामले से हैरान थे। दोनों ही किसान ईमानदार और मेहनती थे। किसी ने कभी नहीं सोचा था कि ये दोनों आपस में इस तरह भिड़ेंगे। मामला पंचायत तक पहुँचा।
अगली सुबह, पीपल के पेड़ के नीचे पंचायत बुलाई गई। सूरज की किरणें खेतों पर चमक रही थीं, पक्षियों की चहचहाहट गूंज रही थी, और गांव के सारे लोग इस विवाद का नतीजा जानने के लिए इकट्ठा हो गए थे। मुखिया रामनाथ चौधरी ने दोनों पक्षों की बातें ध्यान से सुनीं।
श्यामलाल बोला,
“चौधरी जी, यह ज़मीन हमारे खानदान की है। रघुनाथ जी ने बिना पूछे इस पर हल चला दिया। मेरे पास पुराने पट्टे के कागज़ हैं, जो साबित करते हैं कि यह खेत हमारा है।”
रघुनाथ भी कम न था। उसने कहा,
“चौधरी जी, श्यामलाल झूठ बोल रहा है। मेरे दादा ने ही यह ज़मीन खरीदी थी। पुरानी नहर से आगे तक की ज़मीन हमारी है। मेरे पास भी कागज़ हैं।”
गांव के लोग आपस में कानाफूसी करने लगे। दोनों के पास अपने-अपने सबूत थे।
मुखिया रामनाथ ने दोनों से कागज़ मंगवाए। कागज़ पुराने थे, कई जगह से फटे हुए। लिखावट भी धुंधली हो चुकी थी। सीधे-सीधे फैसला करना आसान नहीं था।
रामनाथ ने थोड़ी देर सोचा, फिर कहा,
“दोनों के कागज़ पुराने हैं और आधे-अधूरे। इस पर फैसला करने से पहले मुझे सच्चाई जाननी होगी। मैं कल खेत पर जाकर खुद सीमा देखूंगा।”
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अगले दिन पूरा गांव खेत पर जमा हुआ। मुखिया ने खेत का मुआयना किया। पुरानी मेड़ें, सूखी नहर, और बबूल के पेड़—सब देखे। फिर उसने गांव के सबसे बुजुर्ग आदमी, काका हरिराम से पूछा,
“काका, तुमने तो इस गांव को कई दशक से देखा है। सच-सच बताओ, यह ज़मीन किसकी थी?”
काका हरिराम ने अपने कांपते स्वर में कहा,
“बेटा, जब मैं जवान था, तब यह ज़मीन श्यामलाल के पिता जोखन के पास थी। रघुनाथ के दादा ने तब यह खेत खरीदा ही नहीं था। यह नहर ही सीमा मानी जाती थी।”
इतना सुनते ही भीड़ में हलचल मच गई। सच्चाई सामने थी।
मुखिया रामनाथ ने सबके सामने फैसला सुनाया,
“कागज़ कमजोर हो सकते हैं, पर गवाह और पुरानी हकीकत झूठ नहीं बोलती। यह ज़मीन श्यामलाल की है। रघुनाथ को उसकी मेड़ वापस करनी होगी। गांव में झगड़ा न रहे, इसलिए मैं कहता हूँ, रघुनाथ भाई, आपस में मेल-मिलाप से रहो। जमीन इंसान के काम आने के लिए है, इंसान जमीन के लिए नहीं।”
रघुनाथ ने सिर झुकाकर गलती मानी और श्यामलाल से माफी मांगी। श्यामलाल ने भी बड़े दिल से रघुनाथ को गले लगा लिया।
उस दिन के बाद से रामपुरा गांव में कोई ज़मीन का विवाद नहीं हुआ। लोग कहते,
“जहां न्याय ईमानदारी से हो, वहां झगड़े पनप नहीं सकते।”
पीपल का वह पेड़ आज भी खड़ा है, मानो उस दिन की गवाही दे रहा हो, जब गांव के पंचायत ने न्याय की मिसाल कायम की थी।
सीख (Moral of the Story):
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर चलने से न्याय अवश्य मिलता है। झगड़े और विवाद बातचीत और निष्पक्षता से सुलझाए जा सकते हैं।
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