दोस्ती | प्रेरणादायक हिन्दी कहानी | Dosti | Motivational Hindi story


 दोस्ती | प्रेरणादायक हिन्दी कहानी | Dosti | Motivational Hindi story

 दोस्ती एक बहोत ही दिलचस्प और भावात्मक कहानी है ।
Photo credit : pixabay.com


एक छोटे से शहर में तैनात एक आर्मी अफसर था, जिनका नाम था श्री वर्मा। उनके परिवार में उनकी पत्नी वसुंधरा और 16 साल का उनका बेटा किरण था।

 किरण बहुत ही सीधा-साधा और होशियार बच्चा था। वह अपने माता-पिता के साथ रहता था और अपनी पढ़ाई में लगा रहता था। रविवार के दिन भी वो खेलने कूदने के बजाय किताबों में खोया हुआ रेहता । वो काफी शांत और सरल स्वभाव का था ।

एक दिन सुबह 10 बजे के आसपास श्री वर्मा घर के आंगन में बैठे थे तभी एक पोस्टमैन आया और एक पत्र दे कर चला गया। उसकी पत्नी वसुंधरा खिड़की से सब देख रही थी। पत्र पढकर श्री वर्मा का चेहरा मायूस हो गया।

नास्ता करनके लिए पत्नी ने आवाज दी,"ओ जी सुनते हो , नास्ता तैयार है। नास्ता कर लो।" खामोश चेहरा देखकर वसुंधरा ने तुरंत पूछा, "क्या हुआ? आज काफी परेशानी में लग रहे हो?"
श्री वर्मा, "दूसरे राज्य में पोस्टिंग का लेटर आया है । किरण की चिंता हो रही है।"
 यह खबर सुनते ही पूरे परिवार का मन थोड़ा बेचैन हो गया।

जैसे ही पोस्टिंग हुई, 
नए राज्य में, सब कुछ नया था। नई जगह, नया घर और सबसे बड़ी चुनौती, किरण के लिए एक नया स्कूल।

जब किरण का नए स्कूल में दाखिला हुआ, तो उसे लगा जैसे वह एक अलग ही दुनिया में आ गया है। वहां की भाषा उसे समझ नहीं आती थी। लोग जो भी बात करते, वह सिर्फ उन्हें देखता रहता और समझने की कोशिश करता। भाषा की इस दीवार ने उसे अकेला कर दिया।

क्लास में जब भी कोई टीचर कुछ बोलता और बच्चे हंसते, किरण को लगता कि वे उस पर हंस रहे हैं। वह जब भी किसी से कुछ पूछने की कोशिश करता, तो बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते। 
"अरे, इसे तो कुछ समझ ही नहीं आता," या "देखो, ये कैसे बोल रहा है," जैसी बातें सुनकर उसका दिल टूट जाता। वह बहुत उदास रहने लगा। उसका आत्मविश्वास पूरी तरह से डगमगा गया था। वह अपनी सीट पर चुपचाप बैठा रहता, मानो उसके आस-पास कोई है ही नहीं।

इसी क्लास में एक लड़का था, जिसका नाम विशाल था। विशाल स्वभाव से बहुत अच्छा और दयालु था। वह किरण को अकेला और उदास देखता तो उसे बहुत बुरा लगता। उसने देखा कि कैसे सब बच्चे किरण का मजाक उड़ाते हैं और उसे चिढ़ाते हैं। विशाल ने मन में संकल्प लिया कि वह किरण की मदद जरूर करेगा।

एक दिन, लंच ब्रेक में, जब सब बच्चे खेल रहे थे और किरण अकेला एक कोने में बैठा था, विशाल उसके पास गया।
विशाल: "तुम अकेले क्यों बैठे हो?"
किरण ने धीरे से सिर उठाया और उसे देखा। वह कुछ बोल नहीं पाया, बस उसकी तरफ देखता रहा।
विशाल: "डरो मत, मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ।"
किरण की आँखों में उम्मीद की एक हल्की सी किरण जगी। उसने अपनी टूटी-फूटी भाषा में कहा, "मुझे यहाँ की भाषा नहीं आती।"
विशाल: "कोई बात नहीं। मैं तुम्हें सिखा दूंगा।"

उस दिन से विशाल और किरण की दोस्ती की शुरुआत हुई। वे रोज लंच टाइम में साथ बैठने लगे। कुछ महीनों बाद विशाल ने धैर्य के साथ किरण को वहां की भाषा सिखाई। उसने उसे नए शब्द सिखाए और उसे समझाया कि कैसे लोगों से बात करनी है। धीरे-धीरे, किरण का आत्मविश्वास वापस आने लगा। अब उसे क्लास में अकेला महसूस नहीं होता था, क्योंकि विशाल हमेशा उसके साथ था। वे साथ में खेलते, पढ़ते और अपनी बातें एक दूसरे से साझा करते।

एक दिन, विज्ञान की क्लास में टीचर ने एक सवाल पूछा, जिसका जवाब कोई भी बच्चा नहीं दे पा रहा था। किरण ने धीरे से हाथ उठाया। सब बच्चे उसे देखकर हैरान रह गए। टीचर ने उसे जवाब देने के लिए कहा। किरण ने बिना किसी हिचकिचाहट के सवाल का सही जवाब दिया। पूरी क्लास और टीचर हैरान रह गए। टीचर ने उसकी बहुत तारीफ की।

इस घटना के बाद, किरण का आत्मविश्वास और भी बढ़ गया। वह अब न सिर्फ क्लास में अच्छा प्रदर्शन कर रहा था, बल्कि वह बाकी बच्चों से भी दोस्ती करने लगा था। जो बच्चे पहले उसका मज़ाक उड़ाते थे, अब वे उसकी तारीफ करने लगे थे। चारों तरफ उसकी वाह-वाही होने लगी।

किरण की इस सफलता के पीछे विशाल का हाथ था। अगर विशाल ने उस दिन दोस्ती का हाथ न बढ़ाया होता, तो शायद किरण का आत्मविश्वास कभी वापस न आता। उनकी दोस्ती एक मिसाल बन गई। कठिन समय में सच्ची दोस्ती ही सबसे बड़ा सहारा होती है।

विशाल और किरण की दोस्ती ने यह साबित कर दिया कि भाषा, रंग जात-पात या जगह की दूरी सच्ची दोस्ती के आगे कुछ भी नहीं है।

कहानी की सीख 

दोस्ती दिल से होती है और अगर दिल से कोई रिश्ता बनाया जाए तो वह कभी टूटता नहीं।

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